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हरिद्वार। रोशनाबाद और हेत्तमपुर के बीच इन दिनों लगा मेला अब अपनी चमक-दमक से ज्यादा सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवालों के घेरे में आ गया है। मेले में लगाए गए बड़े-बड़े झूलों पर बच्चों और आम लोगों की भीड़ उमड़ रही है, लेकिन मौके पर झूलों की फिटनेस, तकनीकी सुरक्षा और आवश्यक अनुमति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहा है कि आखिर इस मेले को अनुमति किस विभाग या अधिकारी ने दी है और क्या झूलों को संचालित करने से पहले उनकी तकनीकी फिटनेस की जांच की गई?
सबसे गंभीर चिंता उन ऊंचे झूलों को लेकर है, जिनमें बच्चे और परिवार बैठकर मनोरंजन कर रहे हैं। देखने में कई झूले काफी पुराने और जर्जर नजर आते हैं। ऐसे में यदि किसी झूले का कोई पुर्जा टूटता है, तकनीकी खराबी आती है या विद्युत व्यवस्था में गड़बड़ी होती है तो बड़ा हादसा होने से इनकार नहीं किया जा सकता।
हादसा हुआ तो जिम्मेदार कौन?
सवाल यह भी है कि यदि मेले में कोई दुर्घटना होती है और किसी बच्चे या आम नागरिक की जान चली जाती है अथवा कोई व्यक्ति गंभीर रूप से घायल होता है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
क्या आयोजक की जिम्मेदारी होगी? क्या झूला संचालक जिम्मेदार होगा? या फिर अनुमति देने वाले विभाग और संबंधित अधिकारी से भी जवाब मांगा जाएगा?
इन सवालों का जवाब प्रशासन को सार्वजनिक रूप से देना चाहिए।
झूलों की फिटनेस सबसे अहम
देश के विभिन्न राज्यों में मनोरंजन झूलों के लाइसेंस और सुरक्षा व्यवस्था के लिए अलग-अलग स्थानीय नियम लागू हैं। सरकारी दिशानिर्देशों में आम तौर पर झूले की तकनीकी फिटनेस, स्ट्रक्चरल स्थिरता, विद्युत सुरक्षा, अग्नि सुरक्षा और सार्वजनिक दायित्व बीमा जैसे पहलुओं पर जोर दिया जाता है।
कईं जगह मनोरंजन झूले चलाने से पहले मशीनरी की फिटनेस का प्रमाणपत्र भी आवश्यक माना जाता है। साथ ही विद्युत सुरक्षा की भी जांच जरूरी मानी जाती हैं,
मेले में झूले भारी विद्युत मोटरों और अस्थायी बिजली कनेक्शन से संचालित होते हैं। इसलिए केवल झूले की मशीनरी ही नहीं बल्कि उसकी विद्युत व्यवस्था भी सुरक्षित होना बेहद जरूरी है।
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार विद्युत प्रतिष्ठानों की सुरक्षा जांच और निरीक्षण के लिए Electrical Inspector की व्यवस्था है तथा संबंधित सुरक्षा नियमों के तहत निरीक्षण आवश्यक हो सकता है।
फेयर/एग्जीबिशन की अनुमति भी जरूरी
उत्तराखंड पुलिस अधिनियम में भी सार्वजनिक मनोरंजन और सार्वजनिक आयोजनों को नियंत्रित करने तथा जनसुरक्षा के हित में आवश्यक आदेश जारी करने की शक्ति का प्रावधान है।
तो रोशनाबाद के मेले में क्या-क्या जांचा गया?
अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि रोशनाबाद-हेत्तमपुर के बीच चल रहे इस मेले के संबंध में—
मेले की लिखित अनुमति किस अधिकारी/विभाग ने जारी की?
झूलों की फिटनेस/तकनीकी जांच कब हुई?
क्या प्रत्येक झूले का अलग-अलग फिटनेस प्रमाणपत्र है?
क्या Electrical Safety/Inspectorate से आवश्यक जांच कराई गई?
क्या Fire Safety की व्यवस्था और NOC मौजूद है?
क्या झूला संचालक के पास Public Liability Insurance है?
क्या झूला संचालकों के पास तकनीकी रूप से सक्षम व्यक्ति मौजूद है?
क्या आपात स्थिति में प्राथमिक उपचार और एम्बुलेंस की व्यवस्था है?
क्या भीड़ नियंत्रण और आपातकालीन निकासी की व्यवस्था है?
मेले की जमीन के मालिक/स्थानीय निकाय की अनुमति ली गई है?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या प्रशासन ने मौके पर झूलों का भौतिक निरीक्षण किया है?
प्रशासन को तत्काल करानी चाहिए जांच,
मामला बच्चों और आम जनता की सुरक्षा से जुड़ा होने के कारण संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को मेले का तत्काल निरीक्षण करना चाहिए। यदि सभी जरूरी प्रमाणपत्र और सुरक्षा मानक पूरे हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि लोगों के मन में किसी प्रकार का भ्रम न रहे।
लेकिन यदि किसी झूले की फिटनेस संदिग्ध है या आवश्यक अनुमति/सुरक्षा प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं हैं तो जांच पूरी होने तक ऐसे झूलों को संचालित करने की अनुमति देना लोगों की जिंदगी के साथ जोखिम हो सकता है।
मेला मनोरंजन का स्थान है, मौत का खेल नहीं। इसलिए प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि मेले में जाने वाले हर बच्चे और परिवार की सुरक्षा किसी भी हालत में मनोरंजन से कम महत्वपूर्ण न हो।
एक जरूरी बात: भाई, “सभी झूले कबाड़ हो चुके हैं” या “कोई NOC नहीं है” जैसी बात तभी पक्के तौर पर लिखना बेहतर होगा जब आपके पास मौके की फोटो/वीडियो या संबंधित विभाग से पुष्टि हो। अभी खबर में मैंने इसे “सवाल/आरोप/जांच की मांग” के रूप में रखा है, जिससे खबर ज्यादा मजबूत और कानूनी तौर पर सुरक्षित रहेगी।
