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भूमिका/
पत्रकारिता एक ऐसा कार्य जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह केवल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की चेतना, सत्ता पर निगरानी और आम जनता की आवाज़ बनने का दायित्व निभाती है। स्वतंत्र भारत में पत्रकारिता ने आज़ादी की लड़ाई से लेकर लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने तक ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। किंतु वर्तमान समय में पत्रकारिता एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। इस संकट का सबसे बड़ा कारण है—पत्रकारिता के क्षेत्र में लगातार बढ़ती जा रही दलाल मानसिकता और तथाकथित दलाल पत्रकारों की संख्या।यह प्रवृत्ति न केवल पत्रकारिता के स्तर को गिरा रही है, बल्कि उसके अस्तित्व पर भी सीधा खतरा बन चुकी है।एक ऐसा खतरा जिसे टालना असल पत्रकारिता के नियंत्रण से बाहर हो चूका है ,
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्य की खोज, जनहित की रक्षा, सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना और सत्ता से सवाल करना रहा है। एक सच्चा पत्रकार न लाभ देखता है, न सत्ता का भय; वह केवल सच के साथ निर्भीकता से खड़ा रहता है।
लेकिन आज का यथार्थ इससे भिन्न दिखाई देता है। पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा अब जनसेवा नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वार्थ, आर्थिक लाभ और सत्ता की दलाली का माध्यम, प्रसाशनिक अधिकारियों कि गुलामी ओर चापलूसी करता नजर आ रहा है,ऐसे बहुत से तथाकथित पत्रकार है जो प्रसाशनिक अधिकारियों के दफ़्तरों मे बैठे नजर आते है ओर उनकी जी हुजूरी करके घर का चूल्हा जला रहे है, ओर सच ये भी है कि सरकारी अधिकारियों, विभागों संस्थानो,क्षेत्रीय नेताओं को परेशान करने मे भी इन्ही दलालो के नाम आते है ना तो इन्हे पत्रकारिता के सम्मान कि परवाह है ओर ना ही इसके ओधे कि,अधिकारियों ओर नेताओं की जी हुजूरी करना इसलिए भी इनकी मज़बूरी है की ना तो ये पत्रकार होते है ओर ना ही इनका पत्रकारिता से कोई सरोकार, रही बात सच लिखने की… तो निश्चिंत रहिये सच लिखना तो दूर ये झूठ लिखने के भी काबिले नही होते.. इनकी पत्रकारिता कलम से नही बल्कि चापलूसी ओर दलाली से रेंगती है, जो समाज पर एक खतरा तो है ही साथ ही पत्रकारिता पर एक ग्रहण भी है.ओर दुर्भाग्य ये है की इन्हे लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की शरण लेकर आगे बढ़ना पड़ रहा है,
इनकी फ़र्ज़ी पत्रकारिता “क्या सच है” के आधार पर नहीं, बल्कि “किससे कितना लाभ मिलेगा” के आधार पर तय होती है,
इनकी दलाल पत्रकारिता वह प्रवृत्ति है जिसमें पत्रकार या मीडिया संस्थान—खबर छापने या न छापने के बदले धन लाभ लेते हैं,बदले मे सत्ता, प्रशासन या माफिया के पक्ष में खबरें गढ़ते हैं,विज्ञापन, ठेके, पोस्टिंग या व्यक्तिगत फायदे के लिए खबरों का सौदा करते हैं,सच को दबाकर झूठ या आधा-अधूरा टूटा फूटा लिखकर सच परोसते हैं, ये वही दलाल पत्रकार है जो पत्रकारिता की आड़ में दलाली करते हैं और पत्रकारिता की साख को लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं।
ऐसे दलालों की बढ़ती संख्या के कारण ही व्यावसायीकरण और बाजारवाद का होना तय हो रहा है, ओर मीडिया संस्थानों का अत्यधिक व्यावसायीकरण भी इस संकट की जड़ में है। टीआरपी, व्यूज़ और मुनाफे की अंधी दौड़ मे ये पत्रकारिता को उद्योग बना चुके है।
आज जो लोग बिना शिक्षा,बिना ज्ञान,बिना प्रशिक्षण,बिना डिग्री के मात्र एक फेसबुक पेज बनाकर, कोई न्यूज पॉर्टल, बनाकर कोई यूट्यूब बनाकर एक ही दिन मे योग्यता के सारे सर्टिफिकेट हासिल कर स्वयं को सीधे न्यूज एडिटर ओर प्रधान संपादक कि उपाधि से नवाज रहे है क्या वे पत्रकारिता का उपहास नहीं उड़ा रहे.? क्या वे उन पत्रकारों कि वरिष्ठता को ठेंगा नहीं दिखा रहे. जिनकी कलम मे आज भी स्याही मेहनत कि कमाई से भरी जा रही है..? या फिर जिनके बलबूते पर पत्रकारिता सम्भली हुई है,
आज कि पत्रकारिता का बड़ा दुर्भाग्य है कि योग्यता की जगह सिफारिश चलन मे है,आज कई जगह पत्रकार बनने के लिए न प्रशिक्षण चाहिए, न नैतिक समझ। मात्र एक मोबाइल के बल पर लोग खुद को पत्रकार घोषित कर रहे हैं। इससे दलाल तत्वों को खुला मैदान मिल रहा है।ना उनकी कोई योग्यता, ना कोई शिक्षा,ना पत्रकारिता से कोई संबंध,….
यह एक कड़वा सच है की ईमानदार पत्रकारों को कम वेतन, अस्थायी नौकरी और दबाव का सामना करना पड़ता है। वहीं दलाली करने वाले तथाकथित मैदान-ए-पत्रकारिता मे उतरते ही अधिकारियों कि दलाली,चापलूसी ओर लोगो को ब्लैकमेल कर अपनी जेबें भरने का काम कर रहे हैं। यह असंतुलन भी ईमानदार पत्रकारिता को कमजोर कर रहा है।.आज की पत्रकारिता का दुर्भाग्य ये भी है कि कई बार दलाल पत्रकारों को सत्ता और प्रशासन का अप्रत्यक्ष संरक्षण भी मिल रहा है। वे सत्ता के लिए ढाल बनते हैं और बदले में लाभ उठाते हैं।
ओर शायद इसी कारण दलाल ओर फर्ज़ी पत्रकारिता का सीधा असर असल पत्रकारिता की गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर पड़ रहा है। गली मुहल्लो मे घूम रहे फ़र्ज़ी व दलाल पत्रकारों के कारण आज वर्तमान मे जनता का मीडिया से भरोसा उठ चूका है,इन पत्रकारों कि वास्तविकता सच लिखना नहीं बल्कि सच का गला घोंटना है, जहाँ एक ओर ईमानदार मेहनती असल पत्रकार बेखौफ होकर सच लिखते है मुद्दों को जनता के सामने लाते है तो दूसरी ओर इन फ़र्ज़ी दलाल पत्रकारों के द्वारा वास्तविक समस्याएं और जनहित के मुद्दे दबाने का प्रयास किया जाता है ।या यूँ कहें कि प्रसाशनिक अधिकारी या नेता अपने प्रति ईमानदारी से भरी इनकी चापलूसी व दलाली वाली पत्रकारिता के माध्यम से इनका अच्छा खासा उपयोग करते है,ओर इनके माध्यम से ऐसी फर्जी खबरों का प्रसार: मनगढ़ंत और प्रायोजित खबरें प्रसारित करवाई जाती है जो समाज को सिर्फ भ्रमित करती हैं।
लेकिन सच यही है कि जब पत्रकारिता कमजोर होती है, तो लोकतंत्र भी कमजोर होता है। यदि मीडिया सत्ता से सवाल न करे, भ्रष्टाचार उजागर न करे और जनता की आवाज़ न बने, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था केवल नाम की रह जाती है।परन्तु जगह जगह घूम रहे दलाल पत्रकार सत्ता और जनता के बीच सेतु बनने के बजाय, सत्ता और माफिया के एजेंट बन रहे हैं।जिस कारण भ्रष्टाचार आज चरम पर पहुँच चूका है, आम आदमी की समस्याएं अनसुनी हो रही हैं,प्रशासन निरंकुश हो चूका है,जगह जगह माफिया राज तेजी से फ़ैल रहा है,
यहीं अगर हम बात करें ग्रामीण और स्थानीय पत्रकारिता की तो स्थिति ये है कि सबसे ज्यादा नुकसान स्थानीय और ग्रामीण पत्रकारिता को हुआ है। छोटे शहरों और कस्बों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग पत्रकार बन रहे हैं जिनका उद्देश्य केवल पहचान, धमकी और वसूली है।
ये लोग दुकानदारों, स्कूलों, अस्पतालों और सरकारी दफ्तरों से “खबर छापने या रोकने” के नाम पर सौदेबाजी करते हैं। इससे असली, जमीनी पत्रकारिता लगभग खत्म होती जा रही है।इनका उदेश्य पत्रकारिता कि आढ मे सिर्फ ब्लेकमेलिंग है, ज़ब जिले मे कोई बड़ा अधिकारी कुर्सी संभालता है तो गुलदस्ता लेकर सबसे पहले लाइन मे अधिकतर यही दलाल पत्रकार दीखते है, जो अधिकारी को गुलदस्ता देकर अपनी फेसबुक ओर व्हाट्सअप कि डीपी पर उस फोटो को महीनों रखते है ओर स्थानीय लोगो पर उसी के बलबूते प्रभाव दिखाकर अलग अलग रास्तो से मुनाफा कमाते है,ओर इसमें इनकी पूरी मदद करती है डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया,जिस पर कोई अंकुश नजर नही आता,
डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया ने जहां सूचना को लोकतांत्रिक बनाया, वहीं दलाल पत्रकारिता को नया मंच भी दे दिया।
बिना किसी संपादकीय नियंत्रण के पोर्टल, यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज खोलकर लोग खुद को पत्रकार घोषित कर रहे हैं।इतना ही नही एक आईडी कार्ड बनाकर गले मे टांग लेते है, मजे कि बात ये भी है कि उस आईडी कार्ड को खुद ही वेरिफाई करने कि ताकत भी इन्हीं के पास होती है, साथ ही उस आईडी कार्ड पर सीधे मुहर लगती है चीफ एडिटर के नाम से.. जिसके बाद असल खेल कि शुरुआत हो जाती है,
न तथ्य जांच, न नैतिक जिम्मेदारी—बस सनसनी और सौदेबाजी।लेकिन ईमानदार पत्रकारिता अभी भी जीवित है,यह कहना गलत नही होगा कि पूरी पत्रकारिता दलालों के कब्जे में चली गई है। आज भी कई ईमानदार पत्रकार निर्लोभ व निस्वार्थ अपनी कलम से सच सामने ला रहे हैं।जो कम संसाधनों में भी निष्पक्ष रिपोर्टिंग कर रहे हैं,सत्ता और माफिया के दबाव के बावजूद भी निर्भीक होकर सच लिखना नहीं छोड़ रहे,वास्तव मे ये पत्रकारिता के गिरते स्तर को संभाल रहे है, ओर पत्रकारिता की असली आत्मा को जीवित रखे हुए हैं,लेकिन दुर्भाग्य कि उनकी संख्या आज कम होती जा रही है, और यही सबसे बड़ा चिंता का विषय है।
अब सवाल ये भी है इन दलालों पर अंकुश कैसे लगे,तो स्पस्ट है कि समाधान और सुधार की बड़ी आवश्यकता है कुछ ऐसे बिंदु है जिन पर ध्यान देने कि आवश्यकता है
1.पत्रकार बनने के लिए स्पष्ट मापदंड, प्रशिक्षण और पंजीकरण प्रणाली होनी चाहिए, ताकि फर्जी और दलाल तत्वों की पहचान हो सके।
2. मीडिया संस्थानों की जवाबदेही- मीडिया हाउस को व अपने कर्मचारियों की नैतिक जिम्मेदारी लेनी होगी और दलाल पत्रकारों का बहिष्कार करना होगा साथ ही उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई ओर जाँच की जिम्मेदारी लेनी होगी।
3. असल पत्रकारों का आर्थिक और सामाजिक संरक्षण आवश्यक हो,
ईमानदार पत्रकारों को सुरक्षित,वातावरण, व समय समय पर राज्य सरकार द्वारा उनसे पत्रकारिता मे सुधार कि सलाह ओर जानकारी ली जाए,
4. जनता की भूमिका भी मेहतत्वपूर्ण स्थान रखती है,जनता को सजग होना होगा। झूठी और प्रायोजित खबरों को नकारना और असल पत्रकारिता का समर्थन करना होगा,
5.पत्रकारिता के लिये आवश्यक शैक्षिण योग्यता का होना अनिवार्य किया जाये,पत्रकारिता मे डिग्री व डिप्लोमा धारकों को वरीयता दी जाये,
6.कोई भी पत्रकारिक संस्थान किसी लालच मे पड़कर, अयोग्य, व अशिक्षित लोगो के हाथों मे अपने संस्थान कि आईडी या भर्ती ना करे,
क्योंकि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, एक मिशन भी है। यदि इसमें दलालों की संख्या यूं ही बढ़ती रही, तो न केवल पत्रकारिता का स्तर गिरेगा, बल्कि लोकतंत्र की नींव भी कमजोर हो जाएगी।
आज आवश्यकता है आत्ममंथन की—पत्रकारों, मीडिया संस्थानों, प्रशासन और समाज सभी को मिलकर यह तय करना होगा कि हमें कैसी पत्रकारिता चाहिए:उन्हें ब्लेकमेलरों दलालो को स्वयं सबक सीखाना होगा, उनकी पहचान करनी होंगी, ओर सम्बंधित विभाग या सूचना विभाग को निर्भीक होकर उनकी सूचना देनी होंगी,
